हाल ही नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन, हैदराबाद में हुए एक शोध के शोधकर्ताओं ने पाया कि लगातार एक तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सेहतमंद रहने के लिए हर तीन महीने के अंतराल में तेल की वैराइटी को बदलना चाहिए। आमतौर पर कुकिंग ऑयल में तीन तरह के फैटी एसिड सैचुरेटेड, अनसैचुरेटेड और ट्रांस फैटी एसिड पाए जाते हैं।
इनमें से सैचुरेटेड (दूध व अन्य से तैयार होते हैं) और ट्रांस फैटी एसिड शरीर के लिए नुकसानदायक है जो कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ाकर कई रोगों का कारण बनते हैं। अनसैचुरेटेड (पेड़-पौधे व सब्जियों से निकले तत्त्व से तैयार) में मोनोअनसैचुरेटेड (जो सामान्य में लिक्विड व तापमान के घटने पर जम जाए) और पॉलिअनसैचुरेटेड फैटी एसिड (जो किसी भी तापमान में लिक्विड फॉर्म में ही रहे) होते हैं।
इसलिए बदलाव जरूरी...
हमारे शरीर को ऐसे कई अहम फैटी एसिड्स की जरूरत होती है जिनकी पूर्ति फल या सब्जी से नहीं हो पाती है। इसके लिए खाने में सही तेल को चुनें जो उस विशेष तत्त्व की पूर्ति कर सके। हर तेल में एक विशेष फैटी एसिड होता है व ऐसे में यदि व्यक्ति एक ही तेल का प्रयोग लंबे समय तक करे तो उसके शरीर में अन्य तेल से मिलने वाले फैटी एसिड का अभाव होने लगता है। जो रोजाना कम से कम तीन तरह के तेल का प्रयोग कर रहे हैं उन्हें हर तीन माह में तेल बदलना जरूरी नहीं।
सोयाबीन का तेल
सोयाबीन का तेल शरीर में कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। यह ओमेगा-३,६ का बेहतर स्त्रोत है जो हृदय की सेहत के लिए अहम हैं।
सावधानी : इस तेल का उपयोग डीप फाई करने में न करें वर्ना कोलेस्ट्रॉल का स्तर गड़बड़ा सकता है।
वनस्पति घी खतरनाक
इसमें ट्रांस फैटी एसिड ज्यादा होते हैं जो सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। तेल के मामले में रिफाइंड ऑयल अच्छा विकल्प है। देसी घी को सीमित मात्रा में प्रयोग करें। रोजाना एक चम्मच ले सकते हैं।
सरसों का तेल
सरसों का तेल मोनोअनसैचुरेटेड होता है। इसमें कोलेस्ट्रॉल व एलडीएल की मात्रा कम और विटामिन-ई ज्यादा होता है। यह तेल अस्थमा को कंट्रोल करता है। सरसों में फाइटोन्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं जो गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर को रोकने में मदद करता है। यह शुगर लेवल को भी कंट्रोल करते हैं।
सावधानी : इसे तीन माह ज्यादा प्रयोग में लेने से इसमें मौजूद यूरोसिक एसिड का स्तर बढ़ जाता है, जो ट्राइग्लिसरॉइड के लेवल को भी बढ़ोता है। यह तत्त्व हृदय की कोशिकाओं व फेफड़ों में जमकर नुकसान पहुंचाता है। साथ में अन्य तेल प्रयोग में लें।
नारियल का तेल
इसमें सैचुरेटेड फैट होता है, लेकिन कोलेस्ट्रॉल न के बराबर होता है। यह सेहत के लिहाज से ठीक है, लेकिन इसके साथ अन्य तेलों का प्रयोग करना चाहिए। इस तेल में एंटीबैक्टीरियल व एंटीफंगल गुण होते हैं जो वायरस, फंगस व बैक्टीरिया से बचाव करते हैं। यह तेल वजन घटाने के लिए मददगार है। सावधानी : इसे कभी-कभार सब्जी बनाने में प्रयोग करें लेकिन इस तेल में डीप फ्राई न करें।
मूंगफली का तेल...
मूंगफली का तेल कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। जिससे वजन घटाने में मदद मिलती है। इसे कुकिंग ऑयल के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। साथ ही इसमें भरपूर मात्रा में मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड होते हैं जो शरीर में फैट को बढऩे से रोकते हैं। इसे एंटीऑक्सीडेंट तत्त्व का बेहतर स्त्रोत माना जाता है। इसके अलावा ऑलिव ऑयल मेंं पॉलिसैचुरेटेड फैट्स होते हैं।
सावधानी : यह तेल हृदय की धमनियों में रक्त के प्रवाह को बेहतर करता है। जिससे हृदय रोगों की आशंका कम हो जाती है। लेकिन साथ में कोई और तेल का प्रयोग न करने या हर तीन माह में न बदलने से यह धीरे-धीरे धमनियों में जमने लगता है।
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बदलते रहें अपना कुकिंग ऑयल
हाल ही नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन, हैदराबाद में हुए एक शोध के शोधकर्ताओं ने पाया कि लगातार एक तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सेहतमंद रहने के लिए हर तीन महीने के अंतराल में तेल की वैराइटी को बदलना चाहिए। आमतौर पर कुकिंग ऑयल में तीन तरह के फैटी एसिड सैचुरेटेड, अनसैचुरेटेड और ट्रांस फैटी एसिड पाए जाते हैं।
इनमें से सैचुरेटेड (दूध व अन्य से तैयार होते हैं) और ट्रांस फैटी एसिड शरीर के लिए नुकसानदायक है जो कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ाकर कई रोगों का कारण बनते हैं। अनसैचुरेटेड (पेड़-पौधे व सब्जियों से निकले तत्त्व से तैयार) में मोनोअनसैचुरेटेड (जो सामान्य में लिक्विड व तापमान के घटने पर जम जाए) और पॉलिअनसैचुरेटेड फैटी एसिड (जो किसी भी तापमान में लिक्विड फॉर्म में ही रहे) होते हैं।
इसलिए बदलाव जरूरी...
हमारे शरीर को ऐसे कई अहम फैटी एसिड्स की जरूरत होती है जिनकी पूर्ति फल या सब्जी से नहीं हो पाती है। इसके लिए खाने में सही तेल को चुनें जो उस विशेष तत्त्व की पूर्ति कर सके। हर तेल में एक विशेष फैटी एसिड होता है व ऐसे में यदि व्यक्ति एक ही तेल का प्रयोग लंबे समय तक करे तो उसके शरीर में अन्य तेल से मिलने वाले फैटी एसिड का अभाव होने लगता है। जो रोजाना कम से कम तीन तरह के तेल का प्रयोग कर रहे हैं उन्हें हर तीन माह में तेल बदलना जरूरी नहीं।
सोयाबीन का तेल
सोयाबीन का तेल शरीर में कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। यह ओमेगा-३,६ का बेहतर स्त्रोत है जो हृदय की सेहत के लिए अहम हैं।
सावधानी : इस तेल का उपयोग डीप फाई करने में न करें वर्ना कोलेस्ट्रॉल का स्तर गड़बड़ा सकता है।
वनस्पति घी खतरनाक
इसमें ट्रांस फैटी एसिड ज्यादा होते हैं जो सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। तेल के मामले में रिफाइंड ऑयल अच्छा विकल्प है। देसी घी को सीमित मात्रा में प्रयोग करें। रोजाना एक चम्मच ले सकते हैं।
सरसों का तेल
सरसों का तेल मोनोअनसैचुरेटेड होता है। इसमें कोलेस्ट्रॉल व एलडीएल की मात्रा कम और विटामिन-ई ज्यादा होता है। यह तेल अस्थमा को कंट्रोल करता है। सरसों में फाइटोन्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं जो गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर को रोकने में मदद करता है। यह शुगर लेवल को भी कंट्रोल करते हैं।
सावधानी : इसे तीन माह ज्यादा प्रयोग में लेने से इसमें मौजूद यूरोसिक एसिड का स्तर बढ़ जाता है, जो ट्राइग्लिसरॉइड के लेवल को भी बढ़ोता है। यह तत्त्व हृदय की कोशिकाओं व फेफड़ों में जमकर नुकसान पहुंचाता है। साथ में अन्य तेल प्रयोग में लें।
नारियल का तेल
इसमें सैचुरेटेड फैट होता है, लेकिन कोलेस्ट्रॉल न के बराबर होता है। यह सेहत के लिहाज से ठीक है, लेकिन इसके साथ अन्य तेलों का प्रयोग करना चाहिए। इस तेल में एंटीबैक्टीरियल व एंटीफंगल गुण होते हैं जो वायरस, फंगस व बैक्टीरिया से बचाव करते हैं। यह तेल वजन घटाने के लिए मददगार है। सावधानी : इसे कभी-कभार सब्जी बनाने में प्रयोग करें लेकिन इस तेल में डीप फ्राई न करें।
मूंगफली का तेल...
मूंगफली का तेल कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। जिससे वजन घटाने में मदद मिलती है। इसे कुकिंग ऑयल के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। साथ ही इसमें भरपूर मात्रा में मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड होते हैं जो शरीर में फैट को बढऩे से रोकते हैं। इसे एंटीऑक्सीडेंट तत्त्व का बेहतर स्त्रोत माना जाता है। इसके अलावा ऑलिव ऑयल मेंं पॉलिसैचुरेटेड फैट्स होते हैं।
सावधानी : यह तेल हृदय की धमनियों में रक्त के प्रवाह को बेहतर करता है। जिससे हृदय रोगों की आशंका कम हो जाती है। लेकिन साथ में कोई और तेल का प्रयोग न करने या हर तीन माह में न बदलने से यह धीरे-धीरे धमनियों में जमने लगता है।