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जानिए थैलेसीमिया के इलाज, प्रकार और लक्षण के बारे में

रक्त की लाल रुधिर कोशिकाओं में मौजूद हीमोग्लोबिन फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर शरीर के ऊतकों तक पहुंचाता है। शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी एनीमिया कहलाती है। यह दो तरह के प्रोटीन अल्फा व बीटा से बनता है। इनमें गड़बड़ी से रक्त में रेड ब्लड सेल्स तेजी से नष्ट होने लगते हैं। जिससे खून की कमी हो जाती है।

लक्षण पहचानें -
रोग के प्रकार व मरीज की स्थिति के अनुसार लक्षण अलग हैं। विकृत हड्डियां खासकर चेहरे की, गहरे रंग का यूरिन, शारीरिक विकास न होना, चक्कर, थकान रहना व त्वचा पर पीलापन प्रमुख हैं।

अल्फाथैलेसीमिया -
अल्फा शृंखला की जीन के क्षतिग्रस्त होने से बीटा शृंखला ज्यादा बनती हैं। इससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। अल्फा की 4 जीन असामान्य होने पर इससे ग्रस्त शिशु की गर्भ में ही मृत्यु या शरीर फूल जाता है। वहीं 3 जीन में बदलाव से गंभीर एनीमिया के साथ प्लीहा का आकार बढ़ता है। यदि बदलाव दो जीन में होता है तो रोगी में हल्का एनीमिया व एक जीन में बदलाव से रोग आनुवांशिक बन जाता है।

बीटाथैलेसीमिया-
इसके दो प्रकार हैं।
माइनर: माता या पिता, किसी एक में से असामान्य जीन मिलने से शिशु में बीटा शृंखला की एक जीन ही असामान्य होती है। इसमें हल्का एनीमिया होता है।

मेजर: इसमें बीटा शृंखला के दोनों जीन असामान्य होने से ग्रस्त गर्भस्थ शिशु जन्म के बाद एक वर्ष में ही गंभीर एनीमिया का शिकार हो जाता है। हीमोग्लोबिन 3 ग्रा. से कम, धीमा विकास व लिवर-प्लीहा का आकार बढ़ता है।

गर्भावस्था में-
थैलेसीमिया से ग्रस्त महिला को संक्रमण, हाइपोथायरॉडिज्म, हृदय रोग,बार-बार रक्त चढ़ाने की जरूरत, जेस्टेशनल डायबिटीज व हड्डियों के कमजोर होने की आशंका रहती है। ऐसे में डॉक्टरी सलाह जरूर लें।

इलाज -
ब्लड टैस्ट कर रोग के प्रकार व गंभीरता पर इलाज निर्भर है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट, रक्त चढ़ाने, सप्लीमेंट्स व दवाएं देते हैं। स्थिति अनुसार प्लीहा व पित्ताशय निकाल देते हैं।



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जानिए थैलेसीमिया के इलाज, प्रकार और लक्षण के बारे में

रक्त की लाल रुधिर कोशिकाओं में मौजूद हीमोग्लोबिन फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर शरीर के ऊतकों तक पहुंचाता है। शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी एनीमिया कहलाती है। यह दो तरह के प्रोटीन अल्फा व बीटा से बनता है। इनमें गड़बड़ी से रक्त में रेड ब्लड सेल्स तेजी से नष्ट होने लगते हैं। जिससे खून की कमी हो जाती है।

लक्षण पहचानें -
रोग के प्रकार व मरीज की स्थिति के अनुसार लक्षण अलग हैं। विकृत हड्डियां खासकर चेहरे की, गहरे रंग का यूरिन, शारीरिक विकास न होना, चक्कर, थकान रहना व त्वचा पर पीलापन प्रमुख हैं।

अल्फाथैलेसीमिया -
अल्फा शृंखला की जीन के क्षतिग्रस्त होने से बीटा शृंखला ज्यादा बनती हैं। इससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। अल्फा की 4 जीन असामान्य होने पर इससे ग्रस्त शिशु की गर्भ में ही मृत्यु या शरीर फूल जाता है। वहीं 3 जीन में बदलाव से गंभीर एनीमिया के साथ प्लीहा का आकार बढ़ता है। यदि बदलाव दो जीन में होता है तो रोगी में हल्का एनीमिया व एक जीन में बदलाव से रोग आनुवांशिक बन जाता है।

बीटाथैलेसीमिया-
इसके दो प्रकार हैं।
माइनर: माता या पिता, किसी एक में से असामान्य जीन मिलने से शिशु में बीटा शृंखला की एक जीन ही असामान्य होती है। इसमें हल्का एनीमिया होता है।

मेजर: इसमें बीटा शृंखला के दोनों जीन असामान्य होने से ग्रस्त गर्भस्थ शिशु जन्म के बाद एक वर्ष में ही गंभीर एनीमिया का शिकार हो जाता है। हीमोग्लोबिन 3 ग्रा. से कम, धीमा विकास व लिवर-प्लीहा का आकार बढ़ता है।

गर्भावस्था में-
थैलेसीमिया से ग्रस्त महिला को संक्रमण, हाइपोथायरॉडिज्म, हृदय रोग,बार-बार रक्त चढ़ाने की जरूरत, जेस्टेशनल डायबिटीज व हड्डियों के कमजोर होने की आशंका रहती है। ऐसे में डॉक्टरी सलाह जरूर लें।

इलाज -
ब्लड टैस्ट कर रोग के प्रकार व गंभीरता पर इलाज निर्भर है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट, रक्त चढ़ाने, सप्लीमेंट्स व दवाएं देते हैं। स्थिति अनुसार प्लीहा व पित्ताशय निकाल देते हैं।

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