google.com, pub-5031399508792770, DIRECT, f08c47fec0942fa0 नए मॉलिक्यूलर टैस्ट से आसन है टीबी की पहचान - Ayurveda And Gharelu Vaidya Happy Diwali 2018

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नए मॉलिक्यूलर टैस्ट से आसन है टीबी की पहचान

छोटे बच्चों की कम उम्र में ही मृत्यु का एक कारण ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) है। बच्चों में इस रोग का इलाज थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि वे बलगम को आसानी से निकाल नहीं पाते। इसलिए उनके पेट का पानी निकालकर इलाज किया जाता है और इंड्यूस्ड स्पूटम टैस्ट (इसमें टीबी के कीटाणुओं की जांच माइक्रोस्कोप से की जाती है) से टीबी की जांच की जाती है। लेकिन इस रिपोर्ट को आने में तीन माह का समय लगता है और 5-7 % मामलों में ही यह प्रामाणिक होती है। इसी वजह से अब छोटे बच्चों में टीबी की जांच के लिए मॉलिक्यूलर टैस्ट किया जाने लगा है। ये टैस्ट कार्टि्रज बेस्ड न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन (सीबीनैट) व लाइन प्रोप एस्से (एलपीए) हैं।

जल्दी होती है पहचान : सीबीनैट टैस्ट की रिपोर्ट दो घंटे और एलपीए टैस्ट की रिपोर्ट दो दिन में मिल जाती है। इनसे बच्चों में फेफड़े, दिमाग व अन्य अंगों के टीबी की पहचान करने में आसानी होती है। साथ ही लिक्विड और सॉलिड कल्चर यानी जिन कीटाणुओं की छोटे स्तर पर पहचान नहीं हो पाती उन्हें विकसित कर सूक्ष्म रूप से जांचा जाता है, जिसकी रिपोर्ट छह हफ्तों में आती है।

खतरा : किसी वयस्क संक्रमित टीबी रोगी के संपर्क में आने, कुपोषण, खसरा, कूकर खांसी, माता-पिता से बच्चे में आनुवांशिक रूप से एड्स होने और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण भी टीबी हो सकता है।

बचाव : बच्चों को टीबी के मरीजों से दूर रखें, उन्हें जन्म के बाद ही बीसीजी के टीके लगवाएं। घर में किसी को टीबी होने पर विशेषज्ञ अन्य सदस्यों को एहतियात के तौर पर आइसोनियाजिड दवा लेने की सलाह देते हैं। यह दवा बच्चों और बड़ों दोनों को उनकी उम्र के अनुसार दी जाती है। रोजाना इसकी एक-एक गोली टीबी से बचाव के लिए विशेषज्ञ की सलाह पर ही लेनी होती है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal http://bit.ly/2Ln68TS
नए मॉलिक्यूलर टैस्ट से आसन है टीबी की पहचान

छोटे बच्चों की कम उम्र में ही मृत्यु का एक कारण ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) है। बच्चों में इस रोग का इलाज थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि वे बलगम को आसानी से निकाल नहीं पाते। इसलिए उनके पेट का पानी निकालकर इलाज किया जाता है और इंड्यूस्ड स्पूटम टैस्ट (इसमें टीबी के कीटाणुओं की जांच माइक्रोस्कोप से की जाती है) से टीबी की जांच की जाती है। लेकिन इस रिपोर्ट को आने में तीन माह का समय लगता है और 5-7 % मामलों में ही यह प्रामाणिक होती है। इसी वजह से अब छोटे बच्चों में टीबी की जांच के लिए मॉलिक्यूलर टैस्ट किया जाने लगा है। ये टैस्ट कार्टि्रज बेस्ड न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन (सीबीनैट) व लाइन प्रोप एस्से (एलपीए) हैं।

जल्दी होती है पहचान : सीबीनैट टैस्ट की रिपोर्ट दो घंटे और एलपीए टैस्ट की रिपोर्ट दो दिन में मिल जाती है। इनसे बच्चों में फेफड़े, दिमाग व अन्य अंगों के टीबी की पहचान करने में आसानी होती है। साथ ही लिक्विड और सॉलिड कल्चर यानी जिन कीटाणुओं की छोटे स्तर पर पहचान नहीं हो पाती उन्हें विकसित कर सूक्ष्म रूप से जांचा जाता है, जिसकी रिपोर्ट छह हफ्तों में आती है।

खतरा : किसी वयस्क संक्रमित टीबी रोगी के संपर्क में आने, कुपोषण, खसरा, कूकर खांसी, माता-पिता से बच्चे में आनुवांशिक रूप से एड्स होने और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण भी टीबी हो सकता है।

बचाव : बच्चों को टीबी के मरीजों से दूर रखें, उन्हें जन्म के बाद ही बीसीजी के टीके लगवाएं। घर में किसी को टीबी होने पर विशेषज्ञ अन्य सदस्यों को एहतियात के तौर पर आइसोनियाजिड दवा लेने की सलाह देते हैं। यह दवा बच्चों और बड़ों दोनों को उनकी उम्र के अनुसार दी जाती है। रोजाना इसकी एक-एक गोली टीबी से बचाव के लिए विशेषज्ञ की सलाह पर ही लेनी होती है।

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