google.com, pub-5031399508792770, DIRECT, f08c47fec0942fa0 निरंतर शोर से बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं - Ayurveda And Gharelu Vaidya Happy Diwali 2018

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निरंतर शोर से बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं

शोर की वजह से होने वाले हृदय रोग की प्रक्रिया के विश्लेषण के अनुसार, यातायात और विमानों से उत्पन्न पर्यावरणीय शोर हृदय रोग के जोखिम कारकों को बढ़ाने के लिए, कोशिका स्तर पर शरीर को बाधित करता है। ध्वनि प्रदूषण मैटाबोलिक कठिनाइयों और ऑटोनोमिक असंतुलन का कारण बन सकता है, जिसमें चक्कर आने लगते हैं और व्यायाम करने में परेशानी होती है। शोर के एक्सपोजर से बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।

वाहनों ने निकलने वाले जहरीले धुएं के साथ मिश्रित धूल, फेफड़ों और हृदय रोगों को बढ़ा सकती है और दिल के दौरे, स्ट्रोक, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी बीमारी, फेफड़ों के संक्रमण और फेफड़ों व सांस की नली के कैंसर का खतरा रहता है।

अनचाही आवाजों को शोर कहा जाता है। जोर का शोर 85 डीबी या उससे अधिक होता है यानी आवाज का वह स्तर जो तीन फीट दूर खड़े किसी व्यक्ति से बात करने के लिए उठाना पड़ता है। शोर एक जाना-माना पर्यावरणीय तनाव है, जिसमें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव दोनों शामिल रहते हैं।

यह चिंता, उच्च रक्तचाप, दिल के धड़कने की दर में वृद्धि, अनिद्रा, परेशानी, तनाव से जुड़ा हुआ है। इसके कारण सुनने में कठिनाई हो सकती है। 85 डीबी या उससे कम की आवाजों की सुरक्षित सीमा 8 घंटे का एक्सपोजर है। जोर का शोर होने से बात समझ में नहीं आती और परिणामस्वरूप परफॉर्मेंस खराब हो जाती है और त्रुटियों की संभावना बढ़ जाती है। शोर होने पर, स्पष्ट रूप से अपनी बात कहने के लिए हाई पिच पर बोलना पड़ता है। यातायात के अधिक शोर वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में शांत वातावरण में रहने वालों की तुलना में उदासीनता, अकेलेपन और डिप्रेशन का 25 प्रतिशत अधिक खतरा रहता है। इन्हें ध्यान केंद्रित करने में भी समस्या होती है।

अस्पतालों में भी काफी शोर होता है। रोगियों की भलाई और उपचार के लिए अस्पतालों में शोर के स्तर पर नियंत्रण बहुत महत्वपूर्ण है। शोर डॉक्टरों के लिए एक अस्वास्थ्यकर वातावरण पेश करता है। यह एकाग्रता को प्रभावित करता है और गलतियों की संभावनाओं को बढ़ाता है, जो डॉक्टरों और अस्पतालों के लिए महंगा पड़ सकता है। एक आईसीयू में सामान्य बैकग्राउंड में शोर होने पर न तो चेतावनी सुनी जा सकती है और न ही रोगी निगरानी अलार्म, जो कि संभावित रूप से विनाशकारी साबित हो सकता है। इसके अलावा, डॉक्टरों में भी हाई बीपी और स्वास्थ्य की अन्य समस्याएं हो सकती हैं।

शोर प्रदूषण को कम करने की सलाह :

- स्कूलों और अस्पतालों के आसपास यातायात प्रवाह जितना संभव हो कम से कम किया जाना चाहिए।
- साइलेंस जोन और नो हॉकिंग लिखे हुए साइनबोर्ड इन क्षेत्रों के नजदीक होने चाहिए।

- दोपहिया वाहनों में खराब साइलेंसर और शोर करने वाले ट्रक तथा हॉर्न के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।
- पार्टियों और डिस्को में लाउडस्पीकरों के उपयोग के साथ-साथ सार्वजनिक घोषणा प्रणालियों की जांच होनी चाहिए।

- शोर संबंधी नियमों को साइलेंस जोन के पास सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
- सड़कों के दोनों ओर और आवासीय क्षेत्रों के आसपास पेड़ लगाकर ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।



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निरंतर शोर से बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं

शोर की वजह से होने वाले हृदय रोग की प्रक्रिया के विश्लेषण के अनुसार, यातायात और विमानों से उत्पन्न पर्यावरणीय शोर हृदय रोग के जोखिम कारकों को बढ़ाने के लिए, कोशिका स्तर पर शरीर को बाधित करता है। ध्वनि प्रदूषण मैटाबोलिक कठिनाइयों और ऑटोनोमिक असंतुलन का कारण बन सकता है, जिसमें चक्कर आने लगते हैं और व्यायाम करने में परेशानी होती है। शोर के एक्सपोजर से बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।

वाहनों ने निकलने वाले जहरीले धुएं के साथ मिश्रित धूल, फेफड़ों और हृदय रोगों को बढ़ा सकती है और दिल के दौरे, स्ट्रोक, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी बीमारी, फेफड़ों के संक्रमण और फेफड़ों व सांस की नली के कैंसर का खतरा रहता है।

अनचाही आवाजों को शोर कहा जाता है। जोर का शोर 85 डीबी या उससे अधिक होता है यानी आवाज का वह स्तर जो तीन फीट दूर खड़े किसी व्यक्ति से बात करने के लिए उठाना पड़ता है। शोर एक जाना-माना पर्यावरणीय तनाव है, जिसमें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव दोनों शामिल रहते हैं।

यह चिंता, उच्च रक्तचाप, दिल के धड़कने की दर में वृद्धि, अनिद्रा, परेशानी, तनाव से जुड़ा हुआ है। इसके कारण सुनने में कठिनाई हो सकती है। 85 डीबी या उससे कम की आवाजों की सुरक्षित सीमा 8 घंटे का एक्सपोजर है। जोर का शोर होने से बात समझ में नहीं आती और परिणामस्वरूप परफॉर्मेंस खराब हो जाती है और त्रुटियों की संभावना बढ़ जाती है। शोर होने पर, स्पष्ट रूप से अपनी बात कहने के लिए हाई पिच पर बोलना पड़ता है। यातायात के अधिक शोर वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में शांत वातावरण में रहने वालों की तुलना में उदासीनता, अकेलेपन और डिप्रेशन का 25 प्रतिशत अधिक खतरा रहता है। इन्हें ध्यान केंद्रित करने में भी समस्या होती है।

अस्पतालों में भी काफी शोर होता है। रोगियों की भलाई और उपचार के लिए अस्पतालों में शोर के स्तर पर नियंत्रण बहुत महत्वपूर्ण है। शोर डॉक्टरों के लिए एक अस्वास्थ्यकर वातावरण पेश करता है। यह एकाग्रता को प्रभावित करता है और गलतियों की संभावनाओं को बढ़ाता है, जो डॉक्टरों और अस्पतालों के लिए महंगा पड़ सकता है। एक आईसीयू में सामान्य बैकग्राउंड में शोर होने पर न तो चेतावनी सुनी जा सकती है और न ही रोगी निगरानी अलार्म, जो कि संभावित रूप से विनाशकारी साबित हो सकता है। इसके अलावा, डॉक्टरों में भी हाई बीपी और स्वास्थ्य की अन्य समस्याएं हो सकती हैं।

शोर प्रदूषण को कम करने की सलाह :

- स्कूलों और अस्पतालों के आसपास यातायात प्रवाह जितना संभव हो कम से कम किया जाना चाहिए।
- साइलेंस जोन और नो हॉकिंग लिखे हुए साइनबोर्ड इन क्षेत्रों के नजदीक होने चाहिए।

- दोपहिया वाहनों में खराब साइलेंसर और शोर करने वाले ट्रक तथा हॉर्न के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।
- पार्टियों और डिस्को में लाउडस्पीकरों के उपयोग के साथ-साथ सार्वजनिक घोषणा प्रणालियों की जांच होनी चाहिए।

- शोर संबंधी नियमों को साइलेंस जोन के पास सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
- सड़कों के दोनों ओर और आवासीय क्षेत्रों के आसपास पेड़ लगाकर ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

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